मर्यादा का महासिंधु: श्री राम
अवध पुरी के राज-दुलारे, दशरथ की आंखों के तारे।
त्याग-मूर्ति वह धर्म-रक्षक, सत्मार्ग के सूर्य उजियारे।।
सौम्य - भाल पर सूर्य सा, नयनों में करुणा का वास।
मिटाने धरा से अधर्म - अंधेरा, चुना स्वयं ही वनवास।।
कष्ट भरे थे राह किन्तु, चेहरे पर न आयी शिकन।
राज-पाट को तिनका माना, निभाया पिता-वचन।।
हाथ धनुष और कांधे तरकस, दुष्टों के वे काल बने।
अहिल्या का उद्धार किया, पतितों के प्रतिपाल बने।।
शबरी के जूठे बेर खाकर, चखा प्रेम का अनन्य स्वाद।
जाति-पाति का भेद मिटा, मिटा दिया सब वाद-विवाद।।
साहस ऐसा कि सिंधु कांपे, विनय हृदय का गहना था।
रावण बाली सा महाप्रतापी, जिनके सम्मुख ढहना था।।
विजय पर भी विनय न छोड़े, विभीषण को मान दिया।
अंतिम क्षण में शत्रु से भी, ज्ञान का पावन दान लिया।।
आदर्श बंधु, मर्यादा का महासिंधु, हनुमत के प्राण प्रिये।
सीता के पावन सतीत्व की, रक्षा के हित जो सदा जिये।।
केवल राजा नहीं श्रीराम जी, मानवता का रखवाला है।
भीतर के भी रावण को मारें, ऐसी वह दिव्य ज्वाला है।।
मात्र नाम का लेकर सहारा, पत्थर जल पर तर जाते हैं।
राम - बाण के पाठ मात्र से, भव - बाधा मर जाते हैं।।
राम नाम ही सार जगत का, राम ही आदि और अंत है।
शाश्वत-सत्य, सत्कर्म-साधक, शांति प्रदायक भगवंत है।।
रचना - विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम - बोड़राबांधा (पाण्डुका)
मो. - 9993690899